स्मृतियां
Awhad Zaki भाई हमारे टनाटन की खूबसूरती
जिसे हम टनाटनीयो के इलावा ये म्लेच्छ दस्यु कभी नही समझ पाएंगे 😕😐
भर्तारं लंघयेद्या तु स्त्री ज्ञातिगुणदर्पिता ।
तां श्वभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते ।।
-मनु स्मृति, 8, 371
जो स्त्री अपने पैतृक धन और रूप के अहंकार से पर पुरूष सेवन और अपने पति का तिरस्कार करे उसे कुत्तों से नुचवा दे।
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Awhad Zaki भाई इन सवालो का जवाब दे कर आप Gulshan HK Sweeti Riya Hamid Khan Shah Lucknowi Asia G. जैसे म्लेच्छ का मुह बन्द कर दो वर्ना ये लोग हम मुह से पैदा होने वाले श्रेष्ठो को मात्र मूत्र पिने और गोबर खाने वाला whatsapp University का छात्र समझेंगे 😐😐
#मनुषमृति_में_औरत_की_स्तिथि_उनके_साथ_बेवहार
#और_उनका_अधिकार
मनुषमृति अनुसार
1 पति पत्नी को बेच सकता है त्याग सकता है लेकिन फिर भी पत्नी को उसी का पत्नी बन कर रहना है
2,स्त्री को आज़ादी नही देना चाहिए उन्हें अपने बस में रखें
3,स्त्री स्वतन्त्रा के योग्य नही है
4,स्त्री दोनों कुलो को कलंकित करती है
5, स्त्रियाँ रूप की परीक्षा नहीं करतीं हैं, न तो अवस्था का ध्यान रखती हैं, सुन्दर हो या कुरूप, पुरुष होने से ही वे उसके साथ संभोग कर लेती हैं।
6,स्त्री पराये मर्द से भोग की ईक्षा रखती है पुरुष के विरुद्ध कार्य करती है
7 ,मनु जी ने सृष्ट्यादि में शय्या, आसन, आभूषण, काम, क्रोध, कुटिलता, द्रोह और दुराचार स्त्रियों के लिये ही कल्पना की थी।
8,स्त्रियों को मन्त्रों के ज्ञान का अधिकार नहीं है। उनकी झूठ में ही स्थिति है
1, न निष्क्रयविसर्गाभ्यां भर्तुर्भार्या विमुच्यते।
एवं धर्मं विजानीमः प्राक्प्रजापतिनिर्मितम्॥9.46॥
बेचने से या त्याग देने से स्त्री पति के पत्नीत्व से अलग नहीं होती है। यह धर्म पूर्व में प्रजापति ने बनाया है; उसे हम लोग जानते हैं।
2, अस्वतन्त्राः स्त्रियः कार्याः पुरुषैः स्वैर्दिवानिशम्।
विषयेषु च सज्जन्त्यः संस्थाप्या आत्मनो वशे॥9.2॥
पुरुषों को अपनी स्त्रियों को कभी स्वतंत्रता-स्वछंदता नहीं देनी चाहिये। स्त्रियाँ यदि रूप-रसादि में आसक्त हों, तो भी अपने वश में रखना चाहिये।
,3, पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥9.3॥
स्त्रियों की बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्र रक्षा करता है। स्त्री कभी स्वतंत्रता के योग्य नहीं होती।
4,सूक्ष्मेभ्योऽपि प्रसङ्गेभ्यः स्त्रियो रक्ष्या विशेषतः।
द्वयोर्हि कुलयोः शोकमावहेयुररक्षिताः॥9.5॥
थोड़ी, छोटी-छोटी कुसङ्गति से भी स्त्रियों की विशेष रक्षा करें; क्योंकि अरक्षित होने पर वह दोनों कुलों को कलंकित करती है
5,नैता रूपं परीक्षन्ते नासां वयसि संस्थितिः।
सुरूपं वा विरूपं वा पुमानित्येव भुञ्जते॥9.14॥
स्त्रियाँ रूप की परीक्षा नहीं करतीं हैं, न तो अवस्था का ध्यान रखती हैं, सुन्दर हो या कुरूप, पुरुष होने से ही वे उसके साथ संभोग करती हैं।
6, पौंश्चल्याच्चलचित्ताच्च नैस्नेह्याच्च स्वभावतः।
रक्षिता यत्नतोऽपीह भर्तृष्वेता विकुर्वते॥9.15॥
पुंश्चल पराये पुरुष से भोग की इच्छा दोष से, चंचलता से और स्वभाव से ही स्नेह न होने के कारण, घर में यत्नपूर्वक रखने पर भी स्त्रियाँ पुरुष के विरुद्ध कार्य करती हैं।
7, शय्याऽऽसनमलङ्कारं कामं क्रोधमनार्जवम्।
द्रोहभावं कुचर्यां च स्त्रीभ्यो मनुरकल्पयत्॥9.17॥
मनु जी ने सृष्ट्यादि में शय्या, आसन, आभूषण, काम, क्रोध, कुटिलता, द्रोह और दुराचार स्त्रियों के लिये ही कल्पना की थी।
8, नास्ति स्त्रीणां क्रिया मन्त्रैरिति धर्मे व्यवस्थितिः।
निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रीभ्योऽनृतमिति स्थितिः॥9.18॥
धर्म शास्त्र की व्याख्या के अनुसार स्त्रियों की जातकर्मादि क्रियायें मंत्रों से नहीं करनी चाहिये। उन्हें मन्त्रों के ज्ञान का अधिकार भी नहीं है। उनकी झूठ में ही स्थिति है
Vijay arona भाई इसपे आप का क्या कहना है
परासर स्मृति अध्याय 4 श्लोक 61 कहता है की जो स्त्री अपने दरिंद्र रोगी धूर्त पति का भी अपमान करे तो वह मर कर बारम्बार कुत्ती और सुकरी बनती है
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Shah Lucknowi , बाबा निराला मलेच्छो
अभी Vijay arora भाई मनुषमृति के इस श्लोक का जवाब दे कर तुम म्लेच्छ दस्यु का मुह बन्द कर देंगे 😕😐
भर्तारं लंघयेद्या तु स्त्री ज्ञातिगुणदर्पिता ।
तां श्वभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते ।।
-मनु स्मृति, 8, 371
जो स्त्री अपने पैतृक धन और रूप के अहंकार से पर पुरूष सेवन और अपने पति का तिरस्कार करे उसे कुत्तों से नुचवा दे।
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कुछ ज़ाहिल बेगैरत बेशर्म लोग इस्लाम पर झूठा इलज़ाम लगा कर हमे भी मजबूर करते है की हम उनकी किताबो को खोले और यह बताये की जो तुम whatsapp University से झूठ का पुलिंदा ले कर इस्लाम पे थोप कर अपने जैसा साबित करने की नाकाम कोसिस करते हो वह इस्लाम में नहीं बल्कि तुम्हारे खुद की ग्रंथो में तुम्हारे समाज सभ्यता में है
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सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते।
सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सतां सकृत्॥ मनुस्मृति 9.47॥
भाइयों में सम्पत्ति का बँटवारा एक बार ही होता है। कन्यादान एक ही बार होता है, किसी वस्तु का दान एक ही बार होता है; ये तीनों कार्य सज्जनों के लिये एक ही बार होते हैं।
भवार्थ:भाइयों के बीच संपत्ति का बंटवारा केवल एक बार होता है। दूल्हे को कन्या का दान (विवाह) केवल एक बार किया जाता है और धर्मात्मा, सज्जन, सम्माननीय, कुलीन पुरुषों द्वारा वस्तु का दान केवल एक ही बार किया जाता है।
किसी स्त्री से दोबारा विवाह करना पाप है क्योंकि उसका पहले ही दान किया जा चुका है। जो वस्तु एक बार दान कर दी गई हो उसे भूलकर भी दोबारा दान नहीं करना चाहिए क्योंकि यह पाप है। ऐसे अपराध के लिए व्यक्ति को लंबे समय तक नरक में भेजा जाता है।
इस श्लोक से यह पता चलता है की
औरत एक वस्तू है पति चाहे जैसा भी हो ज़ालिम हो नसेड़ी गंजेड़ी औरत पर जुल्म करने वाला औरत को प्रताड़ित करने वाला हो लेकिन पत्नी उसे नही छोड़ सकती है
और ना ही कोई विधवा औरत दुबारा विवाह कर सकती है वर्ना पाप होगा नर्क में जायेगी चाहे वह भरी जवानी में ही क्यों न बिधवा हो गई हो एक बार जो कन्यादान हो गया सो हो गया यानि कन्या को दान कर किया जाता है
सायद इसी कारण छोटी छोटी बच्चियो को देवदासी के नाम पर मन्दिरो में दान किया जाता था और आज भी भारत की बहुत जगहों पर किया जाता है
यही बात परासर स्मृति भी कहती है
परासर स्मृति अध्याय 4 श्लोक 32 तो पति के मरने के बाद पत्नी को पति के साथ सती होने की बात कहती है और ऐसा करने वाली स्त्री साढे तिन करोड़ अर्थात जितने रोंगटे शारीर में है उतनी साल स्वर्ग में जायेगी
परासर स्मृति अध्याय 4 श्लोक 61 कहता है की जो स्त्री अपने दरिंद्र रोगी धूर्त पति का भी अपमान करे तो वह मर कर बारम्बार कुत्ती और सुकरी बनती है
अब देखे की जिस धर्म ग्रन्थ को ये लोग मानते है उसे ही ठुकरा कर इस्लाम की तरह तलाक और विधवा विवाह को अपना लिए है ☺
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Shah Lucknowi , बाबा निराला मलेच्छो
अभी Vijay arora भाई मनुषमृति के इस श्लोक का जवाब दे कर तुम म्लेच्छ दस्यु का मुह बन्द कर देंगे 😕😐
भर्तारं लंघयेद्या तु स्त्री ज्ञातिगुणदर्पिता ।
तां श्वभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते ।।
-मनु स्मृति, 8, 371
जो स्त्री अपने पैतृक धन और रूप के अहंकार से पर पुरूष सेवन और अपने पति का तिरस्कार करे उसे कुत्तों से नुचवा दे।
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Vijay Arora महासय जी आप अपने घर समाज अपने ग्रंथो की बाते इस्लाम पर डाल कर इस्लाम को अपने और अपने समाज जैसा साबित करने की नकाम कोसिस ना करें ये गलत बात है
मुझे लगता है की आप अपने ग्रंथो को पढ़ कर वही बाते इस्लाम पर जबरदस्ती थोप रहे है
जैसे की पराशर स्मृति अध्याय 4 श्लोक 31 पति के मरने के बाद पत्नी को ब्रहमचर्य धारण करने को बोलती है
परासर स्मृति अध्याय 4 श्लोक 32 तो पति के मरने के बाद पत्नी को पति के साथ सती होने की बात कहती है और ऐसा करने वाली स्त्री साढे तिन करोड़ अर्थात जितने रोंगटे शारीर में है उतनी साल स्वर्ग में जायेगी
परासर स्मृति अध्याय 4 का ही श्लोक 61 कहता है की जो स्त्री अपने दरिंद्र रोगी धूर्त पति का भी अपमान करे तो वह मर कर बारम्बार कुत्ती और सुकरी बनती है
इसके अतरिक्त भी आप के ग्रंथो में औरतो के लिए ऐसी बाते भरी पढ़ी है
लेकिन इस्लाम में ऐसा नही है आप अपनी घर ग्रंथो की बाते इस्लाम पर थोप कर इस्लाम को अपने जैसा बनाने की नकाम कोसिस न कीजिये
इस्लाम दोनों को बराबर का हक़ देता है खुला इस्लामी कानून में एक प्रकार का तलाक है जो पत्नी द्वारा शुरू किया जाता है। जैसे की तलाक कुछ बैध कारण से मर्द के तरफ से पहल की जाती है
इस्लाम में, एक पत्नी खुला तलाक की पहल कर सकती है यदि उसके पास अपनी शादी को तोड़ने का कोई वैध कारण है । जैसे की
शारीरिक या भावनात्मक शोषण : यदि पति पत्नी के प्रति शारीरिक या भावनात्मक रूप से दुर्व्यवहार करता है, तो वह खुला तलाक ले सकती है।
परित्याग या उपेक्षा : यदि पति ने पत्नी को छोड़ दिया है या उसके और अपने बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों की उपेक्षा कर रहा है, तो पत्नी खुला तलाक की ले सकती है।
असंगत मतभेद : यदि दंपति अपने मतभेदों को सुलझाने और शांति से एक साथ रहने में असमर्थ हैं, तो पत्नी खुला तलाक की ले सकती है।
अगर शादी से पहले औरत मर्द को देखी ना ही और बाद में देखने के बाद औरत को मर्द पसन्द ना हो या उसमे कुछ कमी हो तो भी पत्नी खुला तलाक ले सकती है
असंगति: यदि युगल असंगत है और सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने में असमर्थ है, तो पत्नी खुला तलाक की ले सकती है।
व्यभिचार या बेवफाई: यदि पति ने व्यभिचार किया है या अन्य प्रकार की बेवफाई में संलग्न है, तो पत्नी खुला तलाक ले सकती है ।
इत्यादि इत्यादि
जिस तरीके से एक मर्द को तलाक देने का राइट हैं उसी तरह से औरतों को तलाक देने के कई राइटस इस्लाम ने प्रोवाइड किया हैं शरीयत एक्ट 1937 मे कई टाइप की तलाक का जिक्र हैं
खुला तलाक में औरतो के लिए कुरआन सही हदीस सुन्नत और शरीयत कानून अनुसार कई राइट्स दिए गए हुवे है जो की इस प्रकार है
(खुला तलाक कुरआन की रौशनी में )
(1)तलाके खुला मुबारा~ जिसमे पति पत्नी बैठ कर आपस में समझौता मेल मिलाप करने की कोसीस करें फिर भी अगर बात नही बनती है तो अलग हो जाये जिसका जिक्र
सूरह निशा आयत 128 से 130 तक में मिलता है
पति के तरफ से एक फैसला करने वाले और पत्नी के तरफ से फैसला करने वाले को नियुक्त करके फैसला कर लो (सूरह;4 आयत;35)
तलाके खुला
और तुम (पुरुषों) के लिए यह उचित नहीं है कि तुम (अपनी पत्नियों से) अपने महर (शादी के समय पति द्वारा अपनी पत्नी को दिया गया धन) में से कोई भी वापस ले लो, जो तुमने उन्हें दिया हो, सिवाय इसके कि जब दोनों पक्ष डर है कि वे अल्लाह द्वारा निर्धारित सीमाओं को बनाए रखने में असमर्थ होंगे (उदाहरण के लिए निष्पक्ष आधार पर एक दूसरे के साथ व्यवहार करना) फिर यदि तुम्हें डर है कि वे अल्लाह की ओर से निर्धारित सीमाओं का पालन नहीं कर सकेंगी, तो उनमें से किसी पर कोई पाप नहीं है यदि स्त्री अपने ख़ुला (निरस्त होने) के लिए (महर या उसका कुछ हिस्सा) वापस कर दे। (अल-बकराह 2 आयत:229)
अब इसके बाद मर्द के ऊपर यह वाजिब हो जाता है की वह औरत की खुला के अपील को एक्सेप्ट करके औरत को तलाक दे दें ना की इग्नोर करें
फिर भी अगर मर्द इग्नोर करता है औरत को तलाक नही देता है तो औरत विद्वान क़ाज़ी या इस्लामिक कानून अदालत से फसके निकाह के द्वारा अपनी शादी को खत्म करके मर्द से अलग हो सकती है
जिसमे मर्द के द्वारा तलाक देने की कोई जरूरत ही नही पढ़ती है
तलाके तफविज़- जिसमे मुस्लिम महिला अपने पति को एकतरफा तलाक तब दे सकती है जब अनुबंध में पति से तलाक का अधिकार खुद ली हो जैसे की अगर तुम अपनी जिम्मेदारियो को नही निभाओगे इत्यादि तो मै आप को तलाक दे दूंगी
(खुला तलाक सही हदीस की रौशनी में )
हजरत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रजि0 से रिवायत है कि हजरत सबित बिन कैस रजि0 की बीवी पैगंबर मोहम्मद सल्ल0 के पास गईं और कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! सबित बिन कैस के दीन और अख्लाक पर ऐब नहीं लगाती अलबत्ता मैं इस्लाम में कुफ्र को नापसंद करती हूं.
यह सुनकर पैगंबर मोहम्मद सल्ल0 ने सवाल किया कि क्या वह बाग (जो उसने तुम्हें महर में दिया था) उसे वापस कर सकती हो? उस औरत ने जवाब दिया हां! पैगंबर मोहम्मद स0 ने (साबित बिन कैस) से कहा कि बाग वापस ले लो और इसे तलाक दे दो. (हदीस: सहीह बुखारी- 5273)
इस हदीस से भी यह साबित होता है की औरत मर्द की कमिया खामिया बता कर खुला तलाक ले सकती है और मर्द इंकार नही कर सकता है क्यों की यह हज़रत मोहमद सल्ल0 की आज्ञा है
Maulana Abul Ala Maududi साहब भी अपने बुक
Haqooq-Al-Zaujeen حقوق الزوجین
में पूरी तफ़सील के साथ कुरआन सही हदीस और शरीयत की रौशनी में बताये है की औरत और मर्द दोनों को तलाक का बराबर का अधिकार है
याद रहे की इस्लाम में जायज़ चीजो में तलाक को सबसे बुरा माना गया है तलाक आम तौर पर अंतिम उपाय माना जाता है जब सुलह की सभी प्रयास विफल हो जाए सुलह के सारे प्रयासों के बाद अगर पति पत्नी ने यह तय कर लिया हो की नही अब एक दूसरे के साथ नही रह सकते है अलग होना है
तब तलाक आखरी निर्णय है ताकि एक दूसरे के साथ जबरदस्ती घुट घुट कर रह कर जीवन को जहन्नम नर्क बनाने से बेहतर है की अलग हो कर दोनो नई सिरे से अपनी जिंदगी को सुरु करें
1 अरोड़ा जी अब आप अपनी कही हुई बातो को कुरआन सही हदीस सुन्नत शरीयत से साबित कीजिये या अपनी झूठ के लिए अपनी गलती मान कर माफ़ी मांगिये याद रहे कुरआन सही हदीस सुन्नत शरीयत से ना की बना रेफरेंस की गुगलछाप मछली मार्किट वाले न्यूज़ चैनल या यूट्यूब से
2 क्या आप परासर स्मृति को ऑन करते है
अगर हा तो औरत में विषय में ऐसी बातो को कैसे और अगर ना तो क्यों नही
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